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24 August 2018
प्रियंका जी की कहानियाँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम कहानी नही पढ़ रहे बल्कि कहानी जी रहे हैं ! ख़ास कर प्रेम पत्र; हममें से कितनों ने प्रेम पत्र लिखा होगा और पढ़ा भी होगा, एक वक़्त ऐसा था जब ऊँगली काट कर ख़ून से चिट्ठियाँ लिखी जाती थी और पढ़ने वाला प्रेम में डूब जाता था लेकिन ये मात्र लिखने वाला ही जानता था कि एक छोटे से प्रिक से i love you जैसा विशाल भाव लिये शब्द आसानी से लिखा जाता था ! उसी तरह टाइटल कहानी में प्रियंका जी ने जिस तरह पुरुष भाव को प्रस्तुत किया है वह बेहद सराहनीय है, कभी कभी सोचती हूँ कैसे लिखी होगी; लिखने से पहले जिया होगा फिर बुना होगा ! इस गठन को सलाम !
और मैं आगे बढ़ गई, हर स्त्री को बढ़ जाना चाहिये क्यूँकि प्रेम आत्मसम्मान से बढ़कर नही, लेखिका से माफ़ी माँगते हुए मुझे लास्ट कॉफ़ी सबसे कम पसंद आइ, स्टेशन पर एक रात से आपने मुझे स्टेशन पर खड़ा कर दिया आपकी लेखनी को नमन
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