Customer Review

30 September 2018
प्रियंका ओम को पढ़ना बेचैनियों को पढ़ना है । लगातार संवाद,फ्लैश बैक और मनोविज्ञान का खेल । उनका एक पात्र खुद कहता है,'पाप तो मैं हर रोज करता हूँ...तुम्हे अपनी बेचैनियां देकर ।' प्रियंका ने भी इस संग्रह की भूमिका में लिखा है कि कहानियां लिखना मेरा शौक नहीं,बल्कि खुद को जाहिर करने का एक जरिया है । 'मुझे तुमहारे जाने से नफरत है'और 'लास्ट काफी ' बेचैनी से भरी कहानियां है । पाठक को जैसे किसी सम्मोहन में बांध कर चलती है । कहानी खत्म होती है और आप के भीतर कितनी ही लहरे उठती बैठती रहती है । वाकई अकुलाहटों का पुलंदा ये कहानियां आकर्षित करती हैं ।
One person found this helpful
0Comment Report abuse Permalink

Product Details

4.4 out of 5 stars
125
₹ 49.00