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Periyaar ke Pratinidhi Vichar Paperback – 1 Jun 2016


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Paperback, 1 Jun 2016
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हिन्दी में पेरियार का मूल लेखन और जीवनी उपलब्ध नहीं थी. सामाजिक आंदोलनों और अकादमियों में जो नई हिन्दी भाषी पीढी आई है, वह 'नास्तिक पेरियार' से तो खूब परिचित हैऔर उनके प्रति उनमें जबरदस्त आकर्षण भी है, लेकिन यह पीढी उनके विचारों में कुछ सुनी -सुनाई, आधी-अधूरी बातें ही जानती है. वस्तुतः उसने पेरियार को पढ़ा नहीं है. उनकी 'द रामायाण: अ ट्रू रीडिंग' का हिन्दी अनुवाद 'सच्ची रामायण' शीर्षक से 1968 में 'अर्जक संघ' से जुड़े ललई सिंह ने प्रकाशित किया था, जिसे दिसंबर 1969 में उत्तर प्रदेश सरकार ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाकर प्रतिबंधित कर दिया और उसकी सारी प्रतियां जब्त कर ली. सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर, 1976 के अपने फैसले में प्रतिबंध को गलत बताया एवं जब्त की गई प्रतियां लौटाने के निर्देश दिये. लेकिन कोर्ट के निर्देश के बावजूद सरकार ने 1995 तक प्रतिबंध नहीं हटाया. पेरियार को अपने प्रमुख आदर्शों में गिनने वाले 'कांशीराम' की बहुजन समाज पार्टी जब 1995 में सत्ता में आई, तब जाकर प्रतिबंध हटा. इसके बावजूद इस चर्चित किताब को प्रकाशित करने का साहस किसी प्रकाशक ने नहीं दिखाया. यह किताब प्रमोद रंजन के संपादन में पेरियार के प्रतिनिधि लेखन और जीवनी की पहली मुकम्मल किताब है, जिसमें 'सच्ची रामायण' भी शामिल है.

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Product details

  • Paperback
  • ISBN-10: 8193258460
  • ISBN-13: 978-8193258460
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