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संभोग से समाधि की ओर - Sambhog Se Samadhi Ki Or (Hindi Edition) by [., Osho]

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संभोग से समाधि की ओर - Sambhog Se Samadhi Ki Or (Hindi Edition) Kindle Edition

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Product description

Product Description

"जो उस मूलस्रोत को देख लेता है..."
यह बुद्ध का वचन बड़ा अदभुत है : वह अमानुषी रति को उपलब्ध हो जाता है। वह ऐसे संभोग को उपलब्ध हो जाता है, जो मनुष्यता के पार है।
जिसको मैंने, " संभोग से समाधि की ओर " कहा है, उसको ही बुद्ध अमानुषी रति कहते हैं | एक तो रति है मनुष्य की -- स्त्री और पुरुष की। क्षण भर को सुख मिलता है। मिलता है? -- या आभास होता है कम से कम। फिर "एक रति है, जब तुम्हारी चेतना अपने ही मूलस्रोत में गिर जाती है; जब तुम अपने से मिलते हो। "एक तो रति है - दूसरे से मिलने की। और एक रति है - अपने से मिलने की। "
जब तुम्हारा तुमसे ही मिलना होता है, उस क्षण जो महाआनंद होता है, वही समाधि है। " संभोग में समाधि की झलक है; समाधि में संभोग की पूर्णता है।" ओशो

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु:
प्रेम क्या है?
कामवासना का मूलस्रोत क्या है?
यौन-ऊर्जा का रूपांतरण कैसे संभव?
क्या संभावनाएं हैं मनुष्य की?

अनुक्रम
#1: संभोग : परमात्मा की सृजन-ऊर्जा
#2: संभोग : अहं-शून्यता की झलक
#3: संभोग : समय-शून्यता की झलक
#4: समाधि : अहं-शून्यता, समय-शून्यता का अनुभव
#5: समाधि : संभोग-ऊर्जा का आध्यात्मिक नियोजन

उद्धरण : संभोग से समाधि की ओर - पहला प्रवचन - संभोग : परमात्मा की सृजन-ऊर्जा

"जिस आदमी का 'मैं' जितना मजबूत है, उतनी ही उस आदमी की सामर्थ्य दूसरे से संयुक्त हो जाने की कम हो जाती है। क्योंकि 'मैं' एक दीवाल है, एक घोषणा है कि मैं हूं। मैं की घोषणा कह देती है: तुम 'तुम' हो, मैं 'मैं' हूं। दोनों के बीच फासला है। फिर मैं कितना ही प्रेम करूं और आपको अपनी छाती से लगा लूं, लेकिन फिर भी हम दो हैं। छातियां कितनी ही निकट आ जाएं, फिर भी बीच में फासला है--मैं 'मैं' हूं, तुम 'तुम' हो। इसीलिए निकटतम अनुभव भी निकट नहीं ला पाते। शरीर पास बैठ जाते हैं, आदमी दूर-दूर बने रह जाते हैं। जब तक भीतर 'मैं' बैठा हुआ है, तब तक दूसरे का भाव नष्ट नहीं होता।

सार्त्र ने कहीं एक अदभुत वचन कहा है। कहा है कि दि अदर इज़ हेल। वह जो दूसरा है, वही नरक है। लेकिन सार्त्र ने यह नहीं कहा कि व्हाय दि अदर इज़ अदर? वह दूसरा 'दूसरा' क्यों है? वह दूसरा 'दूसरा' इसलिए है कि मैं 'मैं' हूं। और जब तक मैं 'मैं' हूं, तब तक दुनिया में हर चीज दूसरी है, अन्य है, भिन्न है। और जब तक भिन्नता है, तब तक प्रेम का अनुभव नहीं हो सकता।

प्रेम है एकात्म का अनुभव। प्रेम है इस बात का अनुभव कि गिर गई दीवाल और दो ऊर्जाएं मिल गईं और संयुक्त हो गईं। प्रेम है इस बात का अनुभव कि एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति की सारी दीवालें गिर गईं और प्राण संयुक्त हुए, मिले और एक हो गए। जब यही अनुभव एक व्यक्ति और समस्त के बीच फलित होता है, तो उस अनुभव को मैं कहता हूं--परमात्मा। और जब दो व्यक्तियों के बीच फलित होता है, तो उसे मैं कहता हूं--प्रेम।

अगर मेरे और किसी दूसरे व्यक्ति के बीच यह अनुभव फलित हो जाए कि हमारी दीवालें गिर जाएं, हम किसी भीतर के तल पर एक हो जाएं, एक संगीत, एक धारा, एक प्राण, तो यह अनुभव है प्रेम। और अगर ऐसा ही अनुभव मेरे और समस्त के बीच घटित हो जाए कि मैं विलीन हो जाऊं और सब और मैं एक हो जाऊं, तो यह अनुभव है परमात्मा।

इसलिए मैं कहता हूं: प्रेम है सीढ़ी और परमात्मा है उस यात्रा की अंतिम मंजिल।"—ओशो

About the Author

Born as Chandra Mohan Jain, the Indian mystic and spiritual guru took up the name Osho in 1989. He has many followers in India and abroad, who still adhere to his teachings even after his passing. He was an open-minded spiritual leader, whose opinions were freely voiced, causing extreme reactions, both positive and negative, to his status. He set up ashrams in India and abroad, where followers came to meditate, receive therapy and get peace of mind. He has authored about 650 books, covering a large variety of topics, ranging from different religions to meditation and the human mind.

ISBN-10: 8171822126


Product details

  • Format: Kindle Edition
  • File Size: 1231 KB
  • Print Length: 440 pages
  • Publisher: OSHO Media International (27 March 2018)
  • Sold by: Amazon Asia-Pacific Holdings Private Limited
  • Language: Hindi
  • ASIN: B07BS29R4R
  • Word Wise: Not Enabled
  • Screen Reader: Supported
  • Enhanced Typesetting: Enabled
  • Average Customer Review: 4.3 out of 5 stars 58 customer reviews
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